नई आशा के संचार में माईल स्टोन साबित होता है नववर्ष

बीते वर्ष की सभी यादों को पीछे छोड़ हम अगले वर्ष में नव आशा के साथ प्रवेश करते हैं। साथ ही गणतंत्र दिवस भी मनाते हैं। सकारात्मक सोच के साथ जीवन के हर संघर्ष को जीने का माद्दा रखने वालों के लिए नया साल हमेशा नई आशा के संचार में माईल स्टोन साबित होता है। अर्जित को संचित करने की कवायद और अनार्जित को अर्जित करने का प्रयास करने में ही हमारा जीवन व्यतीत हो रहा है।
वर्तमान परिदृश्य में व्यक्तिगत जिम्मेदारियों एवं संघर्षों के साथ ही देश व समाज जिस अपूर्व संकट व संक्रमणों से गुजर रहा है इससे यह सुनिश्चित हो गया है कि देश व समाज को चुने हुए प्रतिनिधियों एवं नौकरशाहों के भरोसे छोड़ने की अपेक्षा सभी पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर स्वयं के योगदान से भी पोषित करना होगा।
व्यवहारिक दृष्टिकोण से व्यक्ति विकास, सामाजिक विकास एवं राष्ट्रीय प्रगति एक दूसरे के पूरक है इनमें से किसी एक की प्रगति का बाधक होना संपूर्ण प्रगति के बाधक होने का द्योतक साबित हो सकता है। इन्हीं बिन्दुओं पर अगर हम सामाजिक राजनीतिक, आर्थिक, शिक्षा और सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण कारकों पर क्रमानुसार विचार करें तो समग्र विकास का एक साफ सुथरा परिदृश्य दृष्टिगोचर हो सकता है।
सामाजिक योगदान के क्षेत्र में कार्यरत सरकारी एवं गैरसरकारी संगठनों पर समाजोत्थान की महत्ती जवाबदारी आती है। हमारे राष्ट्र का सौभाग्य है कि एक से बढ़कर एक प्रतिभावान एवं दुरदृष्टि से ओतप्रोत दृढ़ प्रतिज्ञ व्यक्ति सामाजिक संगठनों के प्रणेता रहे है। साथ ही महानतम विचारकों का अतिउत्तम साहित्य भी उपलब्ध है। जरूरत तो समाज में मौजूद कुरीतियों पर एक साथ हल्ला बोलने की है। साथ ही साधारण जनमानस जो कि अपने व्यक्तिगत जीवन के झंझवातों के मक्कड़ जाल में उलझा है, उसे सामाजिक जनजागृति की अवधारणा के प्रति प्रेरित करने तथा मलूभुत अधिकारों के प्रयोग के प्रति जागृत करने भर से समाज में आमूलचुल परिवर्तन के दर्शन हो सकते है और सामाजिक संगठन इस भूमिका को संपूर्णता के साथ निभा सकते है।
राजनैतिक परिदृश्य हालांकि ज्यादा धुंधला दिखता है किन्तु सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन निश्चित रूप से इस परिदृश्य को पारदर्शी बना सकता है। जन प्रतिनिधियों के पारंपरिक सामाजिक दोहन को सामाजिक जनजागृति अपनी जिम्मेदारियों के ज्यादा करीब ला सकती है। आज समाज जिन जातिगत, भाषागत एवं प्रांतियता के भंवरजाल में उलझा है एवं बंटा हुआ है अगर जनप्रतिनिधि को चुनते वक्त सिर्फ योग्यता का पैमाना रखे तो देश के कर्णधार राजनीतिक दल भी उपरोक्त सभी पुर्वागृहों से ऊपर उठकर सिर्फ योग्य उम्मीदवारों को प्रस्तुत करने हेतु बाध्य होंगे एवं यही उम्मीदवार अवसर मिलने पर नवभारत निर्माण के सही सुत्रधार साबित हो सकते है। प्रांत एवं भाषाई आधार पर बांटने के कुषडयंत्र को पूर्णता के साथ नकारना भी योग्य कदम हो सकता है।
आर्थिक मोर्चें पर वर्तमान को अगर इतिहास के नजरिये से देखा जाए तो खुले वैश्विक बाजार के एवं आईटी क्रांति के चलते एक सौभाग्यशाली समय है। संचार क्रांति के युग में सूचनाओं के आदान-प्रदान के सुगम साधनों ने पैसा अर्जित करने और आर्थिक स्तर को सुधारने का जबर्दस्त मौका दिया है। तमाम राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय एवं क्षेत्रिय संस्थानों ने अपने उत्पादन क्षमता बढ़ाई है। इसी बढ़ते उत्पादन की विपणन योजनाओं ने रोजगार के अपूर्व अवसर उत्पन्न किए है। इसके प्रति जागरूकता निश्चित ही प्रतिव्यक्ति आय के स्तर को बढ़ा सकती है।
शिक्षा का कोई सब्सिटिट्यूट सामाजिक उत्थान में नहीं हो सकता। शिक्षा ने सदैव जन चेतना के विकास में सर्वाधिक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। प्रत्येक क्षेत्र के वैश्विकरण के युग में शिक्षा ने भी व्यापक रूप धारण किया है। आज तकनीकी शिक्षा बड़े शहरों से निकलकर छोटे शहरों एवं ग्रामीण स्तर तक भी पहुंच चुकी है साथ ही इसके प्रति अभिभावकों का जुड़ाव भी एक खुशनुमा संकेत है। कुल मिलाकर आज के वातावरण में तकनीकी, व्यवसाय से संबंधित, शारीरिक, मानसिक, कृषि आदि के क्षेत्रों के लिए उपयुक्त शिक्षा का वातावरण है इसके प्रति जागरूकताभर आत्मनिर्भरता का स्तर व्यापक कर सकती है।
सुरक्षा का प्रश्न सबसे जटिल बल्कि यक्ष प्रश्न के रूप में उपस्थित है। विगत वर्षों में राष्ट्र ने जितनी दुर्दान्त, दहला देने एवं झकझोर देने वाली घटनाएं सही है, उससे यह प्रश्न पूर्ण रूप से अनुत्तरित हो चला है। देश की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा हेतु एक सक्षम और मजबूत तंत्र संवैधानिक स्तर से मौजूद है। किन्तु राजनीतिक दोहन एवं राजनेताओं की कमजोर इच्छा शक्ति ने इस तंत्र को तहसनहस करके रख दिया है। चुनावी रणनीतियों के मद्देनजर आंतरिक कुशक्तियों एवं बाहरी ताकतों के मेल ने सांप्रदायिकता, जाति एवं वर्गसंघषों का ऐसा ताना बाना बुना है कि जिसे मिटाने के लिए सिर्फ और सिर्फ राजनैतिक इच्छा शक्ति एवं सभी प्रकार के राजनीतिक नफे नुकसान से परे रहकर कदम उठाने होंगे।
हमारे राष्ट्र के गणतंत्र को 60 वर्ष होने जा रहे हैं। गणतंत्र दिवस के उत्सव को मनाना हमारे लिये राष्ट्र गौरव की बात है किंतु गणतंत्र का उत्सव मनाने के साथ-साथ इन 60 वर्षों में 60 जटिल समस्याएं भी सुलझाने की इच्छाशक्ति रखते तो हमारा राष्ट्र हकीकत में महाशक्ति होता। सिर्फ महाशक्ति के अलंकरण मात्र से गर्वित होने के बजाय सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सुरक्षा और शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण कारकों के प्रति सकारात्मक सोच एवं दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ कदम बढ़ाने से हम निश्चित रूप से भारत भूमि को उसके नैसर्गिंक, पारंपरिक सोने की चिड़िया रूप में वापस ला सकते है और ऐसे तमाम अवसर एवं परिस्थितियां यकीनन मौजूद है। संपूर्ण राष्ट्र को आई टेक न्यूज परिवार की ओर से नववर्ष एवं गणतंत्र दिवस की हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
-सम्पादक
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