रिश्तों और मानवता को शर्मसार करती अमानवीय क्रूरता

एकलव्य अपहरण एवं हत्याकाण्ड़ :-
(मुस्कान चतुर्वेदी)

ईर्ष्या, आपसी द्वेष इंसान को दरिंदगी की उस पराकाष्ठा पर ले जाती है, जहां उसके सोचने-समझने की शक्ति खत्महो जाती है, जब तो उसे खून के रिश्ते नजर आते हैं, मानवता नजर आती है और ही उसके लिये मासूमियतकोई मायने रखती है। यहां तक कि मात्र छः माह का मासूम बच्चा, जिसे देखकर क्रूर से क्रूर राक्षस में भी ममत्वउत्पन्न हो जाए, वह निश्छल मासूमियत आपसी रंजिश और जलन की पट्टी बांधे इंसान के घृणित इरादों को भीबदल नहीं पाती।
इसी अमानवीय घृणित क्रूरता का शिकार बना भीलवाड़ा का एक व्यवसायी पंकज व्यास और उसका परिवार। छःमाह पूर्व जब उनके घर पहली संतान के रूप में पुत्र का जन्म हुआ तो असीम खुशियों के बीच उन्होंने सपने में भीनहीं सोचा था कि जिस पुत्र के भविष्य को लेकर वे खुबसूरत सपने संजो रहें हैं, उन सपनों को उनका ही कोई अपनाशीशे के बर्तन की तरह चकनाचूर कर देगा। अपना भी ऐसा, जिसे दुश्मन मानने का वे कभी सोच भी नहीं सकते थे, और वही अपना असीम विश्वास, पूर्ण भरोसा जैसे शब्दों को जमींदोज करता हुआ उन्हें उनके परिवार को कभी मिटने वाला दर्द दे जाएगा।
भीलवाड़ा निवासी पंकज व्यास का इकलौता पुत्र एकलव्य अभी छः माह का हुआ ही था कि उसकी जीवन रेखा हीसमाप्त कर दी गई। एकलव्य के नजदीकी रिश्तेदार ओमप्रकाश दाधीच, जो कि रिश्ते में उसके चाचा लगते थे, नेबड़ी ही बेरहमी से उस मासूम को मौत के आगोश में सुला दिया। यह घटना एक सोची-समझी साजिश का नतीजाथी, जिसके तहत पहले तो एकलव्य का अपहरण किया गया और उसके बाद उसकी हत्या कर दी गई। इतना हीनहीं, एकलव्य का शव एक थैले में रख कर चित्तौड़गढ़ में दुर्ग स्थित खातन बावड़ी में ड़ाल दिया जिसमें कि पहले सेही एक भैंस का शव सड़ रहा था जिसमें एकलव्य का शव तीन दिन तक पड़ा रहा। पुलिस की काफी मशक्कत केबाद एकलव्य की हत्या का राज खुला और हत्यारा कानून की गिरफ्त में गया।
भीलवाड़ा शहर की जवाहर कॉलोनी में रहने वाले पंकज व्यास के घर एक फोन आता है जिस पर उन्हें कहा जाता हैकि शहर के रामस्नेही अस्पताल में बच्चों का निःशुल्क चैक-अप किया जा रहा है। इस सूचना पर पंकज व्यास कीपत्नी रेणु और उसकी बुआ जया व्यास एकलव्य को लेकर अस्पताल पहुंचती हैं, जहां पर ओमप्रकाश के दोस्तकुलदीप और अविनाश पहले से ही उनका इंतजार कर रहे थे।
रेणु के वहां पहुंचने के बाद कुलदीप और अविनाश, एकलव्य को जांच के बहाने रेणु के हाथों से ले लेते हैं और वहांसे बच्चे सहित गायब हो जाते हैं। काफी समय गुजर जाने के बाद पंकज व्यास के पास एक मोबाइल से फोन आताहै जिसमें अपहरण कर्ता पुलिस को सूचना नहीं देने की धमकी देते है। एकलव्य का अपहरण कर कुलदीप औरअविनाश सीधे अस्पताल के बाहर खड़े ओमप्रकाश के पास जाते है और एकलव्य को उसे सौंप देते है। वहां सेओमप्रकाश बच्चे को मोपेड पर शिवाजी गार्डन के पास एक सुनसान जगह पर ले जाता है, जहां वह बच्चे को एकबैग में सुलाकर उसकी चैन बंद कर देता है जिससे ऑक्सीजन नहीं मिल पाने के कारण कुछ ही समय में उसमासुम छः माह के एकलव्य की दम घुटने से सांसें थम जाती है।
एकलव्य को मरा हुआ देखकर ओमप्रकाश घबरा जाता है और उसी समय चित्तौड़ के लिये रवाना हो जाता है।चित्तौड़ पहुंच कर एकलव्य के शव को थैली में लपेट कर कपड़े से बांध कर बैग सहित पत्थर भरकर किला स्थितखातन बावड़ी में ड़ाल देता है जिसमें पहले से ही एक भैंस का सड़ा-गला शव पड़ा था। शव को बावड़ी में फेंकने केबाद ओमप्रकाश वापिस भीलवाड़ा जाता है और पूरे मामले से अनजान बनकर अपने भाई पंकज के साथएकलव्य की तलाश करने का नाटक करता है और एकलव्य के सुरक्षित मिलने की बात कह कर उसके परिवार कोनिरंतर ढ़ांढ़स बंधाता है। इसके साथ ही वह बार-बार चित्तौड़ आकर मौका-मुआयना करता रहता है और रोज रातको करीब बारह बजे मोबाइल नंबर के साथ अपनी आवाज बदलकर पंकज को फोन करता है। कभी किसी शातिरअपराधी की तरह तो कभी किसी बच्चे या बुढ़े आदमी की आवाज में बात करता है जिससे कोई जान ही नहीं पायाकि यह इंसान कोई और नहीं बल्कि पंकज का अपना फुफेरा भाई ओमप्रकाश है। इसी बीच ओमप्रकाश की मां औरपंकज व्यास की बुआ जया व्यास, ओमप्रकाश को पंकज के घर पर होने वाली हर बात की सूचना देती रहती है।
अपने इकलौते बेटे एकलव्य के अपहरण से पंकज का पूरा परिवार परेशान हो जाता है और अपहरण के बाद कोईभी दिन ऐसा नहीं निकलता है, जब वे देवी-देवताओं और देवरों का आसरा लेते हो। देवरों पर उन्हें कहा जाता हैकि एकलव्य सुरक्षित और चित्तौड़ में है। इस सूचना पर चित्तौड़ में एकलव्य की खोज प्रारंभ हो जाती है। एक ओरतो परिवार के लोग एकलव्य को ढूंढ़ने में लगे हुए है तो दूसरी ओर जिला पुलिस टीम बनाकर हर रिश्तेदार सेपूछताछ करने के साथ ही उन पर निगरानी रखती है। इतना ही नहीं, ओमप्रकाश का भाई रामपाल, पंकज औरउसके परिवार को धमकियां देकर मामला वापिस लेने के लिये दबाव बनाता है। ओमप्रकाश और रामपाल कीपत्नियां भी कभी पंकज के घर पर तो कभी कोतवाली में रहकर हर कार्यवाही की खबर अपने पतियों तक पहुंचातीरहती है।
आखिरकार अपहरण के आठवें दिन एकलव्यका शव दुर्ग स्थित खातन बावड़ी में होने कीसूचना पूरे परिवार को स्तब्ध कर देती है औरपुलिस जाप्ते के साथ सभी विजय स्तम्भ केपास उस बावड़ी पर पहुंचते हैं जहां स्थितिअत्यंत ही दुष्वार थी। उस बावड़ी के चारोंतरफ बदबू ही बदबू फैली हुई थी जिसमें सांसलेना भी कठिन हो रहा था। इसके बावजूद दुर्गके एक फोटोग्राफर की नजर उस बैग परपड़ती है जिसमें एकलव्य की लाश थी।
इसके बावजूद भैंस की सड़ी लाश की बदबू और पानी में फैली जलकुंभी को देखकर किसी की भी पानी में जाने कीहिम्मत नहीं हुई। इस पर चित्तौड़गढ़ के डीएसपी अरूण मच्या, भीलवाड़ा एसआई राजेन्द्रसिंह और फोटोग्राफरमनोहर वैष्णव पानी के किनारे आते है। मनोहर और राजेन्द्रसिंह एक बल्ली के सहारे बैग को किनारे पर खींचकरबाहर निकाल लेते हैं। बैग में रखी एकलव्य की लाश इतनी गल चुकी होती है कि पकड़ते ही लाश हाथ से छूट जातीहै। इस स्थिति को देखते ही हर उस आंख से आंसू निकल पड़े जो भी वहां मौजूद थे। एकलव्य के पिता पंकज तोआपे से ही बाहर हो गये और पागलों की तरह चिल्लाते हुए बावड़ी की ओर भागते हैं। वहां खड़े लोग उसे पकड़ते हैं।उसी समय ओमप्रकाश, जो कि पुलिस के दबाव और खौफ की वजह से अपना जुर्म कबूल कर लेता है औरएकलव्य की लाश का पता बताता है, को देखकर पंकज, उसके मामा विष्णु तथा एक भाई अपना आपा खो बैठतेहै। ओमप्रकाश को मारने के लिये आगे बढ़ने पर पुलिस सहित कई लोगों द्वारा पकड़ने पर बड़ी मुश्किल से काबू मेंआते हैं और पुलिस से सिर्फ एक ही बात कहते हैं कि आप ओमप्रकाश को सिर्फ पांच मिनट के लिये हमारे हवालेकर दो।
ओमप्रकाश की गिरफ्तारी की सूचना मिलते ही पंकज के घर पर बैठी ओमप्रकाश की मां जया व्यास वहां सेखिसक लेती है। ओमप्रकाश से एकलव्य की हत्या के बारे में पूछने पर वह पुरी बात का खुलासा कर बताता है किउसने एकलव्य का अपहरण मात्र फिरौती पाने के लिये किया था और जैसे ही पैसे मिलते, वे एकलव्य को वापिसलौटा देते मगर एकलव्य की मौत से सब कुछ गड़बड़ हो गया। वहीं लोगों का कहना है कि ओमप्रकाश नंे अपनेपरिवार दोस्तों के साथ मिलकर एकलव्य का अपहरण और उसकी हत्या की थी क्योंकि ओमप्रकाश और उसकेभाई रामपाल के कोई पुत्र नहीं है, तीन पुत्रियां हैं जिसकी वजह से ईर्ष्यावश उसने एकलव्य की हत्या कर दी।
ओमप्रकाश शादी समारोह में पानी-बतासे और चाट-पकौड़ी की स्टॉल लगाता था और अपहरण में साथ देने वालाएक दोस्त राजपूत कॉलोनी निवासी कुलदीप पुत्र राजेन्द्रसिंह राजपूत उसी के साथ काम करता था। एकलव्य केअपहरण की योजना वह गत तीन माह से बना रहा था और अपहरण से मात्र 10 दिन पहले ही ओमप्रकाश कीमुलाकात पालड़ी निवासी अविनाश लुहार से हुई। अविनाश का शाम की सब्जी मंड़ी में फर्नीचर का व्यवसाय है।ओमप्रकाश ने इन दोनों को फिरौती की राशि में से हिस्सा देने का लालच देकर इस योजना में शामिल किया था।अपहरण और हत्या के इस राज से पर्दा उठाने में लगी पुलिस टीम में डीएसपी भीलवाड़ा उमेश ओझा, डीएसपीचित्तौड़गढ़ अरूण मच्या, डीएसपी एससीएसटी सेल विक्रमसिंह, भीलवाड़ा सीआई राहुल जोशी, चित्तौड़ शहरकोतवाल बोराजसिंह भाटी, भीलवाड़ा से एसआई राजेन्द्रसिंह महावीर सिंह शामिल थे।
पूरी वारदात का खुलासा होने के बाद पुलिस ने बताया कि ओमप्रकाश और उसके साथियों ने जिन नंबरों से पंकजऔर उसके परिवार से बात की थी, उनका पता लगाने पर उन सिमों पर फर्जी दस्तावेज का लगा होना पाया गया।लोगों का कहना है कि एकलव्य के दादाजी जो किसी सदमें के कारण अपने बोलने की शक्ति खो चुके थे वो भीएकलव्य के जन्म के बाद बोलने लग गये हैं। अगर उन्हें एकलव्य की मौत का पता चलेगा तो पता नहीं क्या होगा?
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