खेती और जीवन

गौरव थत्तै :-
हम सब और पूरी दुनिया जानती है कि हमारादेश गांवों का देश है। तभी तो हमारे नेतागाहे-बगाहे कहते रहते हैं कि भारत गांवों मेंरहता है। गांवों का सीधा-साधा मतलब है - खेती। इसका सीधा मतलब हुआ गांवों का देशजिसके जीवन का आधार खेती है।
हम जैसे गांव में रहते हैं, वैसे ही लगभग एकलाख गांव पूरे प्रदेश में हैं, जिनमें तेरह करोड़से भी ज्यादा लोग रहते हैं और इनमें से दसकरोड़़ से ज्यादा लोगों का जीवन पूर्णतःखेती पर ही आधारित है। इनमें से अधिकांश किसान एवं खेतिहर मजदूर हैं। हमारे सारे किसान मिलकर पूरे देशकी आवश्यकताओं का एक बटे पांचवा भाग तो खुद ही पूरा करते हैं। हमारे किसानों में से तीन चौथाई से ज्यादा तोछोटे और सिमांत कृषक हैं जो बीघा-दो बीघा से लेकर पांच एकड़ तक की खेती करते हैं। बहुत सारे लोग मानते हैंकि हमारी जोते छोटी होने के कारण खेती फायदेमंद नहीं रह गई है लेकिन यह तो सोचना ही चाहिये कि छोटी-छोटीजोत वाले बहुत सारे किसान मिलकर पूरे प्रदेश में लाखों टन से ज्यादा पैदा करते हैं और पूरे देश के लोगों की खानेकी जरूरत को पूरा करने में अपना योगदान करते हैं। हां, यह बात सही है कि खेती से जुड़ी समस्याएं लगातारबढ़ती जा रहीं हैं। देश में सुरक्षित अन्न भण्ड़ार तो बढ़ रहें हैं और खाद्यान्न उत्पादन में हमारा देश आत्मनिर्भर भीहो गया है किन्तु अनाज पैदा करने वाले किसान के घर में साल भर खाने का अन्न नहीं है। फसल की पैदावारबढ़ाने के प्रयासों में खेती की लागत बढ़ी है और मिट्टी की गुणवत्ता भी खराब हो रही है तथा रासायनिक खादों औरकीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से हमारा पानी, मिट्टी और पर्यावरण सब खराब (दूषित) होता जा रहा है।
हमारे खेतों में कहीं सिंचाई के साधन नहीं हैं तो कहीं नहर है किन्तु पानी नहीं है। सिंचाई के साधनों की कमी केचलते हमारे छोटी जोत के किसान भी साठ से अस्सी रूपये प्रति घण्टे का पानी खरीदकर फसल पैदा करते हैं औरऐसा करने से हमारी खेती की लागत और बढ़ जाती है। बढ़ती हुई महंगाई का असर खेती की लागत पर भी पड़ा है।पिछले 10-15 वर्षों में ही खाद, बीज, दवाई, डीजल, पानी भाड़ा आदि के भावों में दो से चार गुना तक की बढ़ोतरी होगई है। सच तो यही है कि किसान के पैदा किये गये अनाज को छोड़कर बाकी सब चीजों के दामों में लगातारबढ़ोतरी हो रही है। खेती में लगने वाली लागत लगातार बढ़ने और उपज वास्तविक मूल्य नहीं मिल पाने के कारणखेती नुकसान देने वाली लगने लगी है।
विकास की अंधी दौड़ में हमने अपनी परम्परागत खेती को छोड़कर आधुनिक कही जाने वाली खेती को अपनाया।हमारे बीज-हमारी खाद-हमारे जानवर, सबको छोड़कर हमने अपनाये उन्नत कहे जाने वाले बीज, रासायनिकखाद और तथाकथित उन्नत नस्ल के जानवर। नतीजा, स्वावलम्बी और आत्मनिर्भर किसान खाद, बीज औरदवाई बेचने वालों से लेकर पानी बेचने वालों और कर्जा बांटने वालों के चंगुल में फंस गये। यहां तक कि उन्नत खेतीऔर कर्ज के चंगुल में फंसे कई किसान आत्महत्या करने तक मजबूर हो गये। खेती में लगने वाली लागत औरहोने वाला लाभ भी बड़ा सवाल है किन्तु खेती केवल और केवल लागत और लाभ ही नहीं है। हमारे समाज औरबच्चों का पोषण, मिट्टी की गुणवत्ता पर्यावरण, जैव विविधता, मिट्टी और पानी का संरक्षण, जानवरों काअस्तित्व तथा किसानों और देश की संप्रभुता भी खेती से जुड़े व्यापक मसले हैं।
हम तो परम्परागत तौर पर मिश्रित और चक्रीय खेती करते आये हैं जिसमें जलवायु, मिट्टी की स्थिति और पानीकी उपलब्धता के आधार पर बीजों का चयन होता रहा है। हमारे खेतों में गोबर की खाद और हरी खाद काउपयोग होता था। हमारे पूर्वज पूर्ण जानकार थे, पानी वाली जगहों पर पानी वाली और कम पानी वाली जगहों परकम पानी वाली फसल करते थे। हमारे खेतों में खेती के अलावा फल वाले पौधे, इमारती और जलाऊ लकड़ी के पेड़, जानवरों के लिये चारा, सब कुछ तो होता था किन्तु एक फसली उन्नत और आधुनिक कही जाने वाली खेती केचक्रव्यूह में हमने अपनी परम्परागत एवं उन्नतशील खेती को छोड़ दिया। हमारी खेती केवल अनाज पैदा करने कासाधन मात्र नहीं है बल्कि हमारी संस्कृति से जुड़ी हुई है। हमारी खेती, जल-जमीन-जंगल, जानवर, जन केसहचर्य-सहजीवन और सह-अस्तित्व के परिचायक हैं। ये पांचों एक-दूसरे का पोषण करने वाले और एक-दूसरेको संरक्षण देने वाले हैं। सबका जीवन और अस्तित्व एक-दूसरे पर निर्भर है। और यह भी सही है कि जन के ऊपरस्वयं के विकास के साथ-साथ बाकी सबके भी संतुलित संरक्षण एवं संवर्द्धन की जिम्मेदारी है। हमारी परम्परागतखेती पद्धति सहजीवन और सह-अस्तित्व की परिचायक रही है जबकि आधुनिक खेती संसाधनों के बेहतर प्रयोगके स्थान पर उनके अधिकतम दोहन में विश्वास रखती है। अब तो अधिकांश कृषि वैज्ञानिक, जानकार आदि भीमानने लगे हैं कि हमारी परम्परागत फसल पद्धति ही बेहतर और टिकाऊ है।
यह बात तो सही है कि आबादी बढ़ने के कारण जमीनें बंट गयीं हैं और जोत का आकार छोटा हो गया है किन्तु छोटीजोत का मतलब अलाभकारी खेती तो नहीं है। खेती का लाभ फसल के उत्पादन के साथ उसमें लगने वाली लागतऔर फसल पद्धति के पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के रूप में ही नापा जा सकता है। हमारी अपनी जरूरतों कोपूरा करने के लिहाज से एक ओर तो हमें जमीनी उत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने हैं और दूसरी ओर खेती मेंलगने वाली लागत को कम करते हुए पर्यावरण संतुलन को बनाये रखना है। हम सब को मिलकर ’’छोटी जोतअलाभदायक है’’ जैसे दुष्प्रचारों से निपटने के कारगर उपाय भी ढूंढ़ने पड़ेंगे। वैसे भी यह दुष्प्रचार हमारीजमीनों/खेतों को हड़पने का षड़यंत्र का हिस्सा भी हो सकता है।
हम सब मिलकर वैज्ञानिक सोच, परम्परागत ज्ञान और फसल पद्धतियों के संयोजन से लागत कम करते हुएलाभकारी एवं पर्यावरण हितैषी खेती को अपना कर अपनी फसल, खेत, पानी आदि की गुणवत्ता को बढ़ा सकते हैं।अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिये हमें अपनी खेती को बेहतर बनाना होगा। रासायनिक खादों, कीटनाशकों, पानी और बीज के अनियंत्रित उपयोग को रोकते हुए और टिकाऊ खेती को अपनाते हुए खेती की लागत कम औरउत्पादकता बढ़ाने के प्रयास करने होंगे।
टिकाऊ खेती में ऐसा कुछ भी नहीं है जो हम पहले से नहीं जानते हैं। हमें रासायनिक खादों और कीटनाशकों कामोह त्याग कर जैविक खाद (हरी खाद, गोबर की खाद) जैविक कीटनाशक (गोबर, गौमूत्र, नीम, गुड़, तुलसी, खली आदि) का उपयोग बढ़ाना होगा, आवश्यकता के अनुसार कूडवार खेती अपनानी होगी जिससे केवल खेतीकी लागत में कमी आयेगी अपितु कुल उत्पादन में वृद्धि के साथ मिट्टी और पानी का संरक्षण भी होगा। हम अपनीछोटी जोत की खेती की योजना बनाकर मिश्रित, चक्रीय, जैविक खेती अपनाकर लाभदायक और पर्यावरण हितैषीजोत में परिवर्तित कर सकते हैं।
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