अब आइने में अक्स नहीं, आंकड़ों का इंद्रजाल दिखता है।

’’बेचारा आम आदमी। हर किसी के बहकावे में आ जाने वाला अदना सा आदमी। आह निकलने पर झांसे के मलहम और आश्वासन के उपचार से चुप हो जाने वाला भला आदमी। जानते हो पंडत, महामहिम मेड़म ने क्या फरमाया है ?’हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता मंहगाई से आम आदमी को राहत दिलाने की है।’ है न दो हजार दस की पहली बड़ी गप्प! मंहगाई जग मनमोहन को मुंह नहीं लगा रही तो मेड़मजी क्या चीज हैं। उनके बस में क्या है ?लिखा हुआ ही तो उन्हें पढ़ना है।’’कल ही की बात है। संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए राष्ट्रपति ने मंहगाई पर सरकार के संकल्प को दोहराया था। उसी पर मौलाना की उपरोक्त प्रतिक्रिया थी। वे बड़बड़ाते हुए बैठक में प्रविष्ठ हुए थे। हमें शुबहा तो था कि वे जरूर कोई गुल खिलाएंगे, लेकिन ताबड़तोड़ और पूरी तैयारी के साथ, ये अंदेशा न था। बहरहाल तशरीफ रखने के बाद जिस तरह वो बहस के मूड में आ रहे थे, हमें खटका हुआ। उन्हें रोकना व टोकना जरूरी लगा। वरना हमारा ऑफिस के लिये निकलना कठिन हो जाता। सो हिम्मत कर हमने बीच में टांग अड़ा दी - ’’ये तो बाल की खाल निकालने वाली कोशिश है मौलाना। बजट सत्र हमारी संसदीय प्रणाली का अहम अंग है और आईना है जिसके जरिये सरकार बीते वर्ष की उपलब्धियां गिनाती है और अगले वर्ष के विकास का खाका जनता के समक्ष रखती है। बस यही मुसीबत है हमारी। कुछ न कहो - करो तो नाराजी। कुछ कहो - करो तो भी नाराजी। जैसे राजी ना होने का लाईलाज रोग हमें लगा हो। राजनीति में विरोध के नाम पर विरोध हो रहा है। और जनता है कि कैसे भी राजी नहीं हो रही। अर्जुन की तरह सबका ध्यान भी बस सरकार की खामियों पर टिका है। उसे अच्छाइयां कौन दिखाए ?’’हम अपने किये कहे पर अवाक् थे। कैसे कह गये इतनी बात.........कातर निगाहों से हमने मौलाना को निहारा और नजरों से ही क्षमा याचना की। मौलाना ने अजूबा जान हमें अचरज से घूरा। उनके लिये भी यह हमारा अपरिचित अंदाज था। कुछ पलों की खामोशी के बाद मौलाना का मौन टूटा - ’’खूब कही पंडत तुमने भी। वो जीना मुहाल कर दे तो माफ क्योंकि वह मालिक है और हमें आंसू बहाने की भी आजादी नहीं, क्योंकि ’मत’ ड़ालकर दाता से दीन बन जाना हमारी तकदीर बन गई है। नाराज, और वो भी रिआया - क्या ये हक उसे हासिल है ? बीते साठ सालों से बेचारी अभिभाषण ही तो सुन रही है क्योंकि उसका भरम और भरोसा अभी बना हुआ है, लेकिन तुम संवैधानिक व्यवस्था और संसदीय प्रणाली का आईना कम से कम हमें तो मती ही दिखाना। तुम्हारा ये आईना ही झूठा है। दरअसल व्यवस्था, अव्यवस्था में और प्रणाली, औपचारिकता में बदल गई है। अब आईने में अक्स नहीं, आंकड़ों का इंद्रजाल दिखाई देता है। पहले तो तुम अपना नजरिया बदलो पंडत! नराज कौन किससे है ? अगर तुम्हारा इशारा जनता की तरफ है तो तुम मुगालदे में हो। ये हक तो उसे कभी हासिल ही नहीं हुआ। होता तो उसकी नाराजी का असर भी दिखता। सच तो यह है कि वो नाराज होना जानती ही नहीं। वरना तुम और तुम्हारी सरकार उससे सचेत जरूर रहते। वह तो हर हाल में राजी रहती है, तभी तो घपलों, घोटालों और भ्रष्टाचार का बोलबाला है और यह सब सरकार की निगरानी में हो रहे हैं। उसकी देखरेख में नहीं होते तो हो ही नहीं सकते थे। रिआया तो अपने राजी होने की सजा भुगत रही है और सरकार उसकी रजा का मजा जे रही है। है न पंडत!’’लम्बा-चौड़ा भाषण सुनाकर मौलाना मौन हो गये। मगर बेसमय हमें बदहजमी का शिकार होना पड़ा। उन्होंने हमें तुर्की-ब-तुर्की जवाब दे दिया था। सिक्के के हेड़ और टेल दो ही पहलू होते हैं किन्तु न जाने क्यूं मौलाना को बात का दुम वाला हिस्सा ही रास आता है। वो जो उसे एक बार पकड़ लेते हैं तो छोड़ते ही नहीं हैं। सो हमने भी समर्पण की मुद्रा अपनाई।’’महामहिम राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिये सरकार की मंशा जाहिर हो चुकी है। मंहगाई की मार से रिआया को अब राहत जरूर मिलेगी। आप देख लेना। सरकार ने आयात को उदार बनाया है और सहकारी संस्थाओं से भी मदद ली जा रही है। सरकार की नियत अच्छी है, ये मानकर भरोसा और प्रतीक्षा तो करनी ही पड़ेगी।’’मौलाना ने बात पकड़ ली - ’’जनता करे तो करे। सरकार की नियत पर हमें तो भरोसा नहीं है। होता तो भरोसा भी कर लेंगे। जनता भी कैसे भरोसा करले। खुद सरकार के घटक दलों को भी तो विश्वास नहीं हैं अपने मुखिया पर। विरोधी दलों की तो छोड़ ही दो। उन्होंने तो फैसला सुना ही दिया है स्थगन प्रस्ताव लाने और सदन की कार्यवाही ठप्प करने का। इसका मतलब तो यही हुआ न कि मंहगाई के मुद्दे पर दो चरणों में तीन महिनों तक 35 बैठकों में पक्ष-विपक्ष में नूरा-कुश्ती होती रहेगी। बेचारी जनता समझेगी, ये हमारे लिये लड़ रहे हैं, लेकिन वो क्यों लड़ रहे हांेंगे ?ये तो पत्रकार होने के नाते तुम भी खूब जानते होंगे। विपक्ष की नेता के नाते सुषमाजी का पहला बजट सत्र है। क्या वे इस अवसर को यूं ही गंवा देंगी ?अपनी वक्तृत्व कला को मांजेंगी नहीं ?विपक्ष चर्चाओं में घेरेगा सरकार को और सरकार उससे अछूते निकलने का दिखावा करेगी। सरकार अपनी जगह रहेगी और विपक्ष अपनी जगह। गिराने की हद तक कोई किसी को धकेलेगा नहीं। ये वो जानते हैं कि इसमें दोनों का नुकसान है। पहले हल्ले में ही पेट्रोलियम पदार्थों के भाव बढ़ गये। कम नहीं, अच्छे खासे। नतीजतन दूसरी चीजें भी मंहगी होंगी ही। जब कभी मनमोहन के प्रयास रंग लाएंगे, शंकर दादा बिगाड़ देंगे। कृषि विभाग अपने पास रखने की जिद उन्होंने इसीलिये तो की थी। दादाओं की कमी सरदारजी के दल में भी नहीं है। पहले भी कमी नहीं रही। सीधे सरल अअटल भी उनको नकेल नहीं ड़ाल पाये। पूरे पांच बरस नींद हराम करते रहे। सरदार जी की सादगी आड़म्बरियों से क्या जीत पायेगी ?समर्थन पर टिकी सरकार की विवशता और घटक दलों की दादागिरी से क्या अब तक कोई अनजान रहा है ?फिजुल ही दिलासा देने की दिलेरी दिखा रहे हो पंडत।’’मौलाना से पार पाना आज हमें आसान नहीं दिख रहा था। यू ंतो पलायन हमेशा हमीं को करना पड़ता था लेकिन आज वो हमें मैदान में दौड़ाना चाह रहे थे। मंहगाई की मार से बेदम तो हम भी हैं और जानते हैं कि मौलाना हमेशा आम आदमी के हक में ही बोलते है। सो हमारे विरोध में तर्क के बावजूद भी दम नहीं था।
हमारी पत्रिका उनके सामने धरी रह जाती थी। फिर भी कुछ तो कहना ही था - ’’मौलाना, आप इतना तो मानते ही हैं ना कि विश्व मंदी में भी भारत की अर्थव्यवस्था ठीक रही है। क्या यह सरकार की उपलब्धि नहीं है ?’’
मौलाना जैसे तैयार बैठे थे - ’’बेशक, यह सरकार का प्लस पॉइंट है परंतु पंडत, पहले पटरी पकड़ो। मंदी के दौर में अर्थव्यवस्था जरूर ठीक रही है पर मंहगाई तो बढ़ी और बढ़ती ही रही है। और बढ़ते-बढ़ते अब जान पर आफत बन गई है। इससे तुम्हें इनकार है क्या ?सरकार किसी भी पार्टी की रही हो..........मुखिया उसका चाहे जो रहा हो..........पिछले दो दशकों से मंहगाई की मार निरंतर पड़ रही है या नहीं ?मंदी ने मिटाया मुनाफाखोर उद्योगपतियों को। मंहगाई उससे भी नहीं मिटी।’’
एकाएक हमें सूत्र मिला - ’’मौलाना, बेतहाशा मंहगाई बढ़ने का सारा दोष सरकार पर ड़ालना न्यायोचित नहीं है। इसमें देसी उद्योगपतियों और व्यापारी वर्ग का भी बड़ा हाथ है। फर्जी अभाव दर्शा कर वो चीजों के भाव बढ़ा देते हैं। गोदाम भरकर फिर निकालते नहीं हैं। थोक और खेरची व्यापारी मनमाने दाम लगाते हैं। बिल ना कोई देता है, ना कोई लेता है। इसीलिये लूट का बाजार गर्म है। ऊपर दो रूपयेे बढ़तें हैं, नीचे वाले दस रूपये बढ़ा देते हैं। बेचने वाले बेच रहें हैं और हम जैसे खरीदने वाले खरीद रहें हैं। विरोध कहीं नहीं हैं फिर मंहगाई का रोना कैसा ?क्रेता-विक्रेता के इस विनिमय में सरकार भला क्या करे ?’’
हमारी समझ में हम नई कौड़ी ले आए थे। दांव की तरह उसे आगे करते हुए हमने मौलाना को शह देने की कोशिश की, परंतु मौलाना हर कदम पर चौकन्ने थे। मात कैसे मानते ?’तुम गुगली ड़ालो या स्पिन कराओ, मैदान हमारे ही हाथ रहेगा। तुम्हारी इस बात से कतई इनकार नहीं कि निजी एजेंसियों, मिलों और उद्योगों के साथ थोक और खेरची व्यापारियों का बड़ा हाथ है मंहगाई बढ़ाने में। अधिक से अधिक मुनाफा कमाकर जल्दी पेटी और खोखे बनाने वालों ने मध्यम वर्ग और मजदूर वर्ग की कमर तोड़ दी है। दाम बढ़ाने की बात तो हर दुकानदार करता है किन्तु गुणवत्ता की गारंटी कोई नहीं देता।
इन सबकी निगरानी करने वाला खाद्य विभाग हर घड़ी सोया रहता था। सब खबर होने के बावजूद विभाग अनजान बनने का ड्रामा करता है। फलतः जिसे मौका मिलता है, वह चूकता नहीं है। नाप तौल विभाग नाकारा है इसलिये नेट वेट का चलन ही बंद हो गया। हर जगह ड़िब्बे के तौल सहित सामग्री मिलती है। 100 लीटर मीठे तेल पर यदि 100 रूपये बढ़ते हैं तो उससे बनने वाली सामग्री पर किलो के हिसाब से कई गुना दो-चार रूप्ये प्रति नग पर बढ़ जाते हैं।
प्रशासन पंगु और लाचार है। हर अधिकारी शिकायत की प्रतीक्षा में है। जैसे शिकायत मिलते ही समस्या का हल कर देगा। थानेदार सामने कत्ल होने पर भी रिपोर्ट लिखाने वाले का इंतजार करता है। ऐसा हो गया है हमारा इंतजाम, सिस्टम।’’
विषय विस्तार को टालने की दुष्टि से हमने उन्हें टोका - ’’माननीय मौलाना साहब, आप बिलकुल बजां फरमाते हैं। थोड़े में कहें तो पूरे टब में भांग घुली है। उसमें से लोटा भर भांगरहित जल कैसे निकाल सकते हैं ?सिस्टम की सड़ांध भी एक ऐसी ही समस्या है। इच्छाशक्ति के अभाव में सरकार जिस पर काबू करने में विफल रही है।’’
’’आज तुम्हें ऑफिस जाने की जल्दी नहीं लगती। हमें क्या ?हम भी बैठे हैं आराम से। परंतु किचन में कोई हलचल क्यों नहीं है ?सब खैरियत तो है ना ?हमारा मतलब भाभीजी तो.........................।’’ उन्होंने वाक्य अधूरा छोड़ दिया जिसे पूरा हमें करना था।
’’यू ंतो सब ठीक है मौलाना, पर मंहगाई की मार से शकुनजी भला कैसे अप्रभावित रह सकती है। बेचारी चूल्हे पर कढ़ाई चढ़ाने से पहले कई बार सोचती है। अन्नपूर्णा होने का दावा खुद उन्हें झूठ लगने लगता है। धर में जो आता है, वह टिकता नहीं है। अभी इसी सप्ताह तेल और शक्कर लाये थे।
कल से ड़िब्बों के तले दिख रहे है इसलिये बैठी है बेचारी। यदि आपको फीकी चले तो उनसे चाय का कहें।’’ हमने मौलाना का जायजा लिया। व ेअब तक कई बार करवट बदल चुके थे। यकायक उठे और बिना दुआ-सलाम के ये जा, वो जा। दरवाजे पर जरूर बुदबुदाये - ’’क्या हम होटल समझकर यहां आते हैं ?वैसे भी आज चाय-नाश्ते का मन नहीं था। हमारी तो हंसी निकली ही सही। शकुनजी की खिलखिलाहट ने भी खुश कर दिया।
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