आज दुर्लभ शनि प्रदोष के साथ पुष्य का भी योग इसी दिन संयोग से सौभाग्य योग भी है। कईं सालों में एक बार ऐसा योग बनता है।

आज 20 को दुर्लभ शनि प्रदोष के साथ पुष्य का भी योग इसी दिन संयोग से सौभाग्य योग भी है। कईं सालों में एक बार ऐसा योग बनता है। उज्जैन के पंचांगकर्ता एवं ज्योतिषाचार्य पंण् श्यामनारायण व्यास के अनुसारए प्रदोष शिवरात्रिं व पुष्य नक्षत्र हर माह आते हैंए लेकिन शनिवार को प्रदोष और इस दिन पुष्य नक्षत्र व सौभाग्य योग का संयोग सालों में एक बार बनता है जो इस बार 20 फरवरी को है। शुक्रवार रात 2ण्59 से शनिवार रात 4 बजे तक पुष्य व शनिवार सुबह 7ण्15 से दोपहर 1ण्40 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा। इस तीन योगों के अलावा इस दिन विश्वकर्माए गुरु गोरखनाथ व नित्यानंद जयंती भी इसे और अधिक खास बना रही है। प्रदोष व्रत अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करने वाला है। यह व्रत प्रत्येक महीने के कृष्ण व शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को रखा जाता हैए इसलिए इसे वार के अनुसार पूजन करने का विधान शास्त्र सम्मत माना गया है यदि इन तिथियों को सोमवार हो तो उसे सोम प्रदोष व्रत कहते हैंए यदि मंगलवार हो तो उसे भौम प्रदोष व्रत कहते हैं और शनिवार हो तो उसे शनि प्रदोष व्रत व्रत कहते हैं। विशेष कर सोमवारए मंगलवार एवं शनिवार के प्रदोष व्रत अत्याधिक प्रभावकारी माने गये हैं। तो आइयें जानते हैं शनि प्रदोष व्रत कथा और पूजन विधि का तरीका शनि प्रदोष व्रत विधि प्रत्येक पक्ष की त्रयोदशी के व्रत को प्रदोष व्रत कहते हैं। सूर्यास्त के पश्चात रात्रि के आने से पूर्व का समय प्रदोष काल कहलाता है। इस व्रत में महादेव भोले शंकर की पूजा की जाती है। इस व्रत में व्रती को निर्जल रहकर व्रत रखना होता है। प्रातरू काल स्नान करके भगवान शिव की बेल पत्रए गंगाजलए अक्षतए धूपए दीप सहित पूजा करें। संध्या काल में पुनरू स्नान करके इसी प्रकार से शिव जी की पूजा करना चाहिए। इस प्रकार प्रदोष व्रत करने से व्रती को पुण्य मिलता है। शनि प्रदोष व्रत कथा प्राचीन समय की बात है। एक नगर सेठ धन.दौलत और वैभव से सम्पन्न था। वह अत्यन्त दयालु था। उसके यहाँ से कभी कोई भी ख़ाली हाथ नहीं लौटता था। वह सभी को जी भरकर दान.दक्षिणा देता था। लेकिन दूसरों को सुखी देखने वाले सेठ और उसकी पत्‍नी स्वयं काफ़ी दुखी थे। दुःख का कारण था. उनके सन्तान का न होना। सन्तानहीनता के कारण दोनों घुले जा रहे थे। एक दिन उन्होंने तीर्थयात्रा पर जाने का निश्‍चय किया और अपने काम.काज सेवकों को सोंप चल पड़े। अभी वे नगर के बाहर ही निकले थे कि उन्हें एक विशाल वृक्ष के नीचे समाधि लगाए एक तेजस्वी साधु दिखाई पड़े। दोनों ने सोचा कि साधु महाराज से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा शुरू की जाए। पति.पत्‍नी दोनों समाधिलीन साधु के सामने हाथ जोड़कर बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात हो गईए लेकिन साधु की समाधि नहीं टूटी। मगर सेठ पति.पत्‍नी धैर्यपूर्वक हाथ जोड़े पूर्ववत बैठे रहे। अंततः अगले दिन प्रातः काल साधु समाधि से उठे। सेठ पति.पत्‍नी को देख वह मन्द.मन्द मुस्कराए और आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाकर बोले. श्मैं तुम्हारे अन्तर्मन की कथा भांप गया हूँ वत्स! मैं तुम्हारे धैर्य और भक्तिभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूँ।श् 
साधु ने सन्तान प्राप्ति के लिए उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने की विधि समझाई और शंकर भगवान की निम्न वन्दना बताई।
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार। 
शिव शंकर जगगुरु नमस्कार॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार। 
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार॥ 
हे उमाकान्त सुधि नमस्कार। 
उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार। 
विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार॥ 
तीर्थयात्रा के बाद दोनों वापस घर लौटे और नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करने लगे। कालान्तर में सेठ की पत्‍नी ने एक सुन्दर पुत्र जो जन्म दिया। शनि प्रदोष व्रत के प्रभाव से उनके यहाँ छाया अन्धकार लुप्त हो गया। दोनों आनन्दपूर्वक रहने 
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