महाकाल के द्वारपालों की परिक्रमा: पंचक्रोशी यात्रा हरि लगावे बेड़ा पार के साथ 118 किलोमीटर की 5 दिवसीय यात्रा

भारत का प्राचीन ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक नगर उज्जैन अपने में अनेक विशिष्टताएं समेटे हुए है। परम पावन उज्जयिनी, तीर्थमयी नगरी के रूप में मान्यता प्राप्त है। भारत के प्रमुख द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक उज्जैन महाकाल भी हैं। महाकालेश्वर स्वयंभू दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग हैं। प्रधान शिवतीर्थ होने से यहां अनेक देवता शिवलिंग स्वरूप में स्थित हैं। तीर्थ की चारों दिशाओं में क्षेत्र की रक्षा के लिए चार द्वारपाल शिवरूप में स्थित हैं जिनका उल्लेख स्कंधपुराण अंतर्गत अवन्तिखण्ड में है। पंचेशनि यात्रा जिसे अपभ्रंश में पंचक्रोशी यात्रा कहते हैं इन्हीं चार द्वारपालों की कथा है। पूजा विधान में ईष्ट परिक्रमा का विशेष महत्व है। पंचक्रोशी के मूल में इसी विधान की भावना है। पंचक्रोशी यात्रा वर्तमान में शिव यात्रा है। इस यात्रा में शिव के पूजन, अभिषेक, उपवास, दान, दर्शन की ही प्रधानता धार्मिक ग्रंथों में मिलती है। मोक्ष नगरी उज्जैन के चारों तरफ रंग-बिरंगे साफे, पगडि़यों और सतरंगी लुगड़े, चुनरियों की नई छटा में चिलचिलाती धूप के बावजूद श्रद्धा का अद्वितीय दृश्य उत्पन्न हो जाता है। भक्तिगान की स्वर लहरियां आच्छादित हो जाती है, ‘हरे-हरे शिव महादेवा, पार्वती वल्लभ सदाशिव, हरि लगावे बेड़ा पार, हरि से कर लो मित्राचार’। यह दृश्य निर्मित होता है पंचक्रोशी यात्रा की धर्म और तीर्थ की पैदल यात्रा का, जो इस वर्ष 1 मई से 6 मई तक पांच दिनों के लिए शिव साधना हेतु आरंभ हो रही है, सिंहस्थ महापर्व होने के कारण करीब 5 लाख से अधिक श्रद्धालु भाग लेंगे। संभवतः यह अधिक लागों को पता नहीं होगा कि उज्जैन का महत्व सिंहस्थ और कार्तिक मेले के अलावा पंचक्रोशी की इस यात्रा के कारण भी है। उज्जैन शक्ति और उपासना के मेले का ही नहीं, साधना और भक्ति यात्रा का भी है। आस्था, विश्वास, उदारता और सहनशीलता भारतीय संस्कृति की विशेषताएं है। अवंती नगरी के लिए वेद तो यहां तक कहते है कि इस नगर की धरती के स्पर्श मात्र से ही मोक्ष मिल जाता है। यूँ तो पंचक्रोशी की यात्रा हर साल वैशाख कृष्ण दशमी से शुरू होकर वैशाख अमावस्या को संपन्न होती है। स्कंध पुराण के अनुसार अवन्तिका के लिए वैशाख मास, प्रयाग के लिए माघ और पुष्कर तीर्थ के लिए कार्तिक मास अत्यंत पुनीत है। इसी वैशाख मास के मेषस्थ सूर्य में, वैशाख कृष्ण दशमी से अमावस्या तक इस पुनीत पंचक्रोशी का विधान हैं। लेकिन जब बारह वर्ष में सिंहस्थ आता है तो दिखाई देता है कर्म का मर्म और पर्व का गर्व। जिस प्रकार मेले जाति व सभ्यता की पहचान प्रकट करते है उसी प्रकार यात्रा भक्ति व साधना की एक रूपक है। पंचक्रोशी यात्रा का विश्वास भोले ग्रामीणों के साथ जुड़ा है और यह 99 फीसदी ऐसे धर्मालुओं की आस्था की यात्रा है जो किसान हैं। पंचक्रोशी के यात्री प्रथम दिन शिप्रा स्नान करके ज्योतिर्लिंग भगवान महाकालेश्वर व पटनी बाजार स्थित भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर गोपाल मंदिर, बड़ा सराफा, अरंविन्द नगर, वेश्य टेकरी और उन्डासा तलाई होते हुए पूर्व दिशा में 12 किलोमीटर यात्रा कर पिंगलेश्वर तीर्थवास पहुंचते हैं। यह होता है पांच दिनों की तीर्थयात्रा का पहला पड़ाव। दक्षिण में करोहन मंे दूसरा पड़ाव 23 कि.मी. यात्रा कर पहुंचते है, कायावरूणेश्वर महादेव तीर्थस्थान का मंदिर है। तीसरे दिन का पड़ाव है ग्राम नलवा 27 कि.मी. यात्रा कर बिल्वेश्वर महादेव का मंदिर हैं, चैथे दिन का पड़ाव 28 कि.मी. जैथल है। कालियादेह महल के परिसर में विश्राम का अंतिम मुकाम है। डाबला होते हुए यात्री 16 कि.मी. पैदल यात्रा कर पिंगलेश्वर तीर्थवास आते है और वापस शिप्रा के शीतल जल से स्नान कर ठंडी रेत में दो पल आराम करते है। कच्चे, अंधेरे, ऊबड़-खाबड़ मार्ग पर यह यात्रा होती है। सिर पर खाने की पोटली रखे माथे पर चंदन लगाए और हरे-हरे महादेवा का गान करते हुए यात्री निकल पड़ते हैं। यात्रियों को पहले अपनी यात्रा पूरी करने की लगी रहती है उन्हें सुस्ताने


का समय कहां रहता है इसलिए यात्री मूल स्थान पर निर्धारित समय/तिथि के पूर्व ही पहुंचकर रवाना हो जाते है, खाना बनाना, फिर कुछ देर विश्राम और उसके बाद स्नान कर भगवान के दर्शन कर पुनः रवानगी। यात्रियों का इस दौरान प्रिय भोजन दाल-बाटी है। 118 किलोमीटर की यात्रा में इनके स्वागत के भी इंतजाम होने लगे हैं पर पानी की व्यवस्था का अभाव आज तक है। गीत, संगीत, भजन, नृत्य, माच और फिल्मों के प्रदर्शन भी होने लगे हैं। जहां तक अनाज का सवाल है, प्रशासन द्वारा उचित मूल्य की दुकानें खोली जाती है। ग्रामवासियों द्वारा भी यात्रियों को चाय, शरबत, खिचड़ी आदि की निःशुल्क व्यवस्था की जाती हैं दुग्ध संघ द्वारा दूध सप्लाय, प्रत्येक पड़ाव स्थल पर यात्रा के एक दिन पूर्व से छाया व्यवस्था स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्था की जाती है। पंचक्रोशी यात्रा पहले पंचकोसी कहलाती थी और अब पंचक्रोशी के नाम से जानी जाती है। उज्जैन और शिप्रा के चारों तरफ परिक्रमा ही इस यात्रा का अर्थ हैं। इस यात्रा रूपी शिव आराधना के साथ-साथ चार द्वार व तीर्थ यात्राएं भी होती हैं जो द्वार व तीर्थ यात्राएं भी होती हैं जो पंचक्रोशी की मुख्य यात्रा के समानांतर ही चलती हैं। उज्जैन का आकार चैकोर है और क्षेत्ररक्षक देवता महाकाल बीचों-बीच स्थित है। महाकालेश्वर मंदिर से एक योजन (चार-चार कोस) की दूरी पर महादेव के मंदिर हैं जो द्वारपाल कहलाते है। चार द्वार यात्रा में कुछ यात्रीगण पांचों दिन एक-एक मंदिर मंे दर्शन कर लौट आते हैं और निरंतर पदयात्रा नहीं करते। वहीं दूसरी तरफ अष्ट तीर्थयात्रा पांचवे दिन कर्कराज से आरंभ होकर सोमतीर्थ, रणजीत हनुमान, काल भेरू, सिद्धनाथ, कालियादेह होती हुई मंगलनाथ पर अमावस्या के दिन संपन्न होती है। इस यात्रा के कुल 28 तीर्थ हैं जो सभी शिप्रा नदी के किनारे हैं। वे हैं कर्कराज, नृसिंह, नीलगंगा, संगम, पिशाचामोचन, गधर्वती, केदार, चक्रतीर्थ, सोमतीर्थ, देवप्रयाग, योगीतीर्थ, कपिलाश्रम, धृतकृष्या मधुकृष्या, ओखरतीर्थ, कालभैरव, द्वादशांक, दशाश्वमेघ, अंगारक, स्वर्गतासंगम, ऋणमोचन, शक्तिभेद, पापमोचन, व्यासतीर्थ, प्रेतमोचन, शवदहन तीर्थ, मंदाग्नि और पितामह तीर्थ। इतिहास में उज्जैन की इस पंचक्रोशी यात्रा का वर्णन मिलता है जिसके मुताबिक यह अनादिकाल से प्रचलित है। सम्राट विक्रमादित्य को इस तीर्थ यात्रा को जीवित रखने का श्रेय है, जिन्होंने इसे चैदहवीं सदी तक अनवरत रखा पन्द्रवीं और सत्रहवीं शताब्दी के मुगलकाल में यह लुप्त रही। बाद में मराठाओं ने इसे पुनर्जीवित किया और तब से यह यात्रा प्रसंग अब तक सतत जारी है। वराह पुराण के अनुसार उज्जैन को इस महाक्षेत्र का नाभि देश एवं महाकालेश्वर को प्रमुख देवता निरूपित किया गया है। यूँ भारत में चार तीर्थों का महत्व है पर बद्रीनाथ, केदारनाथ, रामेश्वर, जगन्नाथपुरी, काशी, विश्वनाथ, द्वारिका और सोमनाथ के अलावा पंचक्रोशी भी एक तीर्थधाम है। मोक्षपुरी उज्जैन में पंचायतन क्रम से शिव, विष्णु भक्ति, गणेश और सूर्य की यात्रा पहले प्रचलित थी, पर आजकल शिवयात्रा ने इन सभी का स्थान ले लिया है। शेष यात्राएं लुप्त सी हो गई है यात्रियों की सुविधा के लिए यथा-संभव, प्रकाश, छाया, पड़ाव-स्थलों पर पेयजल की व्यवस्था, नगर निगम उज्जैन तथा ग्राम पंचायतों द्वारा जिला प्रशासन की मदद से की जाएगी। इसी प्रकार चिकित्सा, पेयजल व्यवस्था, सुरक्षा-व्यवस्था, संबंधित विभागों द्वारा की गई। रोवर्स स्काउट, सेवादल एवं अन्य समाजसेवी के साथ ही आवश्यक वस्तुओं की उचित मूल्य की दुकानोें की व्यवस्था, दुग्ध निगम द्वारा दूध-घी विक्रय की व्यवस्था एवं सुरक्षा हेतु पुलिस कर्मचारी व उनके वाहन सुविधा की व्यवस्था की जाती है।
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