“अमृत की चाह है तो पंचक्रोशी की राह है”

उज्जैन  पंचक्रोशी उप पड़ाव नलवा रात के 9.30 बजे सिर पर पोटली धरे ग्रामीण श्रद्धालुओं का हूजूम एक के पीछे एक चला आ रहा है।  हाथ लकड़िया चंदन की जय बोलो यशोदा नंदन की या फिर जय भोले बम भोले के घोष के साथ सरकता भीड़ का रैला रात्रि विश्राम के लिए जगह तलाशता दिख रहा है।  फसल के बाद हांके हुए खेत जिसने मिट्टी के बड़े-बड़े ढेले भी दिनभर से धूप में पैदल (अधिकांश नंगे पांव) चलकर पहुंचे पथिकों को रात में सोने के लिए नहीं रोक पा रहे हैं।  जैसे तैसे जगह बनाकर सोने का यत्न करते श्रद्धालु किसी से शिकायत भी नहीं करते।  भक्ति में लीन इन लाखों श्रद्धालुओं को न किसी सांप, बिच्छू, का डर ना ही कांटे, कंकड़, पत्थर की रोक। बस चादर या कपड़ा बिछाया, पोटली को सिरहाने रखकर भजन-कीर्तन में मग्न हो गये। सिंहस्थ-2016 में इस बार कोई 12 लाख से अधिक श्रद्धालुओं के आने के आंकड़े सामने आ रहे हैं। जिधर देखों उधर स्त्री पुरूषों के सिर पर रखी पोटलियां ही पोटलियां। रात में नलव उप पड़ाव के कई एकड़ में फैले मैदान पर पांव रखने की जमीन नहीं दिख रही थी। थके-मांदे पंचक्रोशी यात्रियों के मनोरंजन के लिये कहीं तेजाजी की कथा हो रही थी तो कहीं रासलीला या भजन-कीर्तन। सबकुछ अदभुत, अलौकिक। अलौकिक इसलिये कि एक ही स्थान पर खुले में एकसाथ दो लाख सो रहे हों, जिनके सिर से सिर और पैर से पैर टकरा रहे हों, ऐसा दृश्य मालवा की धरती पर बारह वर्षों में ही दिखाई पड़ता है। हालांकि जिला प्रशासन यात्रियों के लिये पानी, दूध, खाद्यान्न, कंडे, दवा और मलहम की व्यवस्था करता है, फिर भी श्रद्धालुओं को भक्ति में इतने रमे हाते हैं कि उन्हें किसी सुविधा-असुविधा का खयाल नहीं रहता। रात 11 बजे तक श्रद्धालुओं का तांता लगा हुआ था। लोग रूककर कंडे का अलाव जला मालवी भोजन दाल-बाटी बना रहे थे और फींजा में कंडे के धुए और बाटियों के सिकने की महक बिखरी हुई थी। किसी भी शहरी के लिये यह एक अविस्मरणीय घटना हो सकती है। यद्यपि कई शहरी लोग भी इस यात्रा में शामिल दिखाई दे रहे थे और ग्रामीणों की ही तरह मिट्टी के ढेले वाले खेतों में खुशी-खुशी विश्राम कर रहे थे। एक मई से शुरू हुई इस 118 किलो मीटर लम्बी पंचक्रोशी यात्रा का समापन 6 मई को होना है। इस धार्मिक यात्रा का महत्व कई लोग पुराणों से जोड़ते नजर आते हैं। यात्रा कितनी पुरानी है, इस बारे में कोई लिखित दस्तावेज नहीं है। कुछ लोग इसे सौ वर्ष पुरानी बताते हैं, तो कुछ इससे भी ज्यादा। मान्यताओं के अनुसार तीर्थयात्री भगवान नागचंद्रेश्वर मन्दिर, जो उज्जैन शहर के बीचोबीच स्थित है, से बल प्राप्त कर यात्रा प्रारम्भ करते हैं। और 118 किलो मीटर लम्बी पदयात्रा 40 से 42 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान में करते हैं। छह दिन की इस यात्रा में उज्जैन शहर के चारों ओर स्थित चार द्वारपालों, जो कि शिवरूप में स्थापित हैं, का दर्शन-पूजन कर शिप्रा के पवित्र जल में डुबकी लगाकर अपने घरों को लौटते हैं। पंचक्रोशी यात्रा में साल दर साल श्रद्धालुओं की संख्या बढ़ती जा रही है।
जीवन का उद्धार करने के लिये यात्रा में आयें पंचक्रोशी यात्रियों से चर्चा करना भी कम सुखद अनुभव नहीं है। ये यात्री न तो विद्वान हैं, न साधु, न ही मनीषी। पर इनसे बात करने पर सहसा जीवन का मर्म फूट पड़ता है। ग्राम राजौद जिला धार के 65 वर्षीय जगनारायण बताते हैं कि पिछले पांच वर्षों से वे पंचक्रोशी परिक्रमा कर रहे हैं। यह पूछने पर कि क्यों कष्ट उठाते हो भाई, तो कहते हैं जीवन का उद्धार जो करना है। जगतनारायण को न माया की जरूरत है, न ही सुख-सुविधा की, फिर भी भोले की भक्ति में हर साल बरबस पांव उठ जाते हैं। ग्राम सिमरोल जिला इन्दौर के कृषक सुरेश से पूछा कि पंचक्रोशी यात्रा से क्या मिला? वे कहते हैं भोलेनाथ ने करोड़पति बना दिया है। इन्दौर के पास की जमीन के भाव बेतहाशा बढ़ गये हैं और सुरेश की जमीन की कीमत पांच करोड़ हो गई है। खुशी का इजहार करते हुए कहते हैं कि ये भोले की कृपा है और जब तक पांव चलेंगे, पंचक्रोशी करते रहेंगे।पंचक्रोशी यात्रा का मतलब यह नहीं है कि केवल बुजुर्ग लोग ही इस यात्रा में शामिल हों। कई युवक-युवतियां भी इसमें भाग ले रहे हैं। ग्राम बालरिया के 28 वर्षीय रवि अपने मित्र के साथ यात्रा कर रहे हैं। उनसे पूछा कि इस उम्र में क्यों? रवि ने तनिक शर्माते हुए कहा एक लड़की की चाह है, भोले पूरी करेंगे। पंचक्रोशी की राह में हर तरह के लोग चल रहे हैं और चल रही है लोगों की आस्था, मनौती और चाहत। भोलेनाथ सबकी इच्छा पूरी करते रहे हैं और आगे भी करेंगे। अन्त में यही कहा जा सकता है कि“अमृत की चाह है तो पंचक्रोशी की राह है।“
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