कलारसिक शास्त्रीय नृत्य के माधुर्य में हुए सराबोर अखिल भारतीय नृत्य समारोह का समापन


उज्जैन संस्कार भारती द्वारा आयोजित अखिल भारतीय नृत्य समारोह के आखिरी‍ दिन एक से बढ़कर एक प्रस्तुति हुई। समारोह के दूसरे और आखिरी दिन का प्रमुख आकर्षण देश की सुविख्यात शास्त्रीय नृत्यांगना विदुषी का कथक नृत्य रहा। उनकी भाव-भंगिमाओं एवं ऊर्जावान शारीरिक चपलता ने खूबसूरत एवं आकर्षक मंच पर त्रेतायुगीन जटायु प्रसंग को जीवंत कर दिया। जयपुर घराने की प्रख्यात कथक नृत्यांगना विदुषी सुमीता शर्मा ने कथक नृत्य के माध्यम से गणेश वंदना एवं शिव आराधना की प्रसंग की भावभीनी प्रस्तुति दी। सुश्री सुमीता शर्मा एवं अन्य कलाकारों द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय नृत्य के माधुर्य में कलारसिक देर शाम तक डूबे रहे। संस्कृति उत्सव के तहत संस्कार भारती के तत्वावधान में आयोजित अखिल भारतीय नृत्य समारोह का समापन बुधवार की देर शाम हुआ। शास्त्रीय नृत्यांगना सुमीता शर्मा ने अपने शिष्यों के साथ “रूद्राष्टकम नमामि शमिशाम, निर्वाण रूपम” के पांच श्लोक की प्रस्तुति के साथ अपने नृत्य की शुरूआत की। इसके बाद इन्होंने सरगम प्रस्तुत कर कला-रसिकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी प्रस्तुति में गायन श्री विजय परिहार द्वारा किया गया। तबले पर पंडित रवि कुमार गंगानी, पखावज पर पंडित आशीष गंगानी और सितार पर पंडित विजय शर्मा ने संगत की। नृत्य साधिका सुमीता शर्मा ने जयपुर घराने के सुविख्यात शास्त्रीय नृत्य मर्मज्ञ गुरू कुंदनलाल गंगानी से गुरू शिष्य परंपरा से कथक नृत्य की शिक्षा ली है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की मर्मस्पर्शी सूक्ष्मताओं पर उन्हें महारत हासिल है। सुश्री सुमीता शर्मा की राष्ट्रीय एवं अतर्राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति है। उनकी प्रस्तुतियां विदेशों में ऐलिफेंट फेस्टीवल लंदन सहित सूरीनाम, जापान व त्रिनिदाद जैसे मुल्कों में हो चुकी है। अपने देश के गंगा महोत्सव, खजुराहो नृत्य समारोह, कोर्णाक फेस्टीवल, राजगीर महोत्सव, लखनऊ महोत्सव आदि बड़े-बड़े नृत्य महोत्सवों में हुई विदुषी सुमीता शर्मा की प्रस्तुतियों को खूब वाह-वाही मिली है। सिंहस्थ मेला उजड़खेड़ा सेक्टर में अखिल भारतीय नृत्य समारोह के दूसरे दिन भी पूर्वोत्तर राज्य के मूर्धन्य कलाकारों द्वारा अपने नृत्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति की सतरंगी छटा बिखेरी। समारोह के दूसरे दिन पंडानालूर घराने की प्रख्यात नृत्यांगना सुश्री कृपा फड़के एवं उनके दल द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय नृत्य ने भी समा बांध दिया। भरत नाट्यम नृत्य शैली की पहली प्रस्तुति स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित कृति है, जिसमें भागीरथ तपस्या कर गंगा माता को धरती पर आने का आवाहन करते हैं। गंगा अपनी ऊर्जात्मक धारा को धरती पर आने से पहले भगवान शिव की जटा पर अवतरित करती हैं। इसका सजीव चित्रण सुश्री कृपा फड़के एवं उनके दल द्वारा किया गया। उनका नृत्य राग रेवाती आदि ताल में निबद्ध था। इसी कड़ी में उन्होंने भगवान कृष्ण की लीलाओं पर केन्द्रित संमिश्रण प्रस्तुत किया। इस सभा में स्थानीय कलाकार सुश्री प्रतिभा रघुवंशी और उनके साथियों ने भी कला रसिकों के मानस पटल पर गहरी छाप छोड़ी।
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